


ट्रंप की रणनीति पर भारी पड़ी मोदी की कूटनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन पर दबाव बनाने के लिए नाटो देशों के साथ मिलकर नए प्रतिबंधों और टैरिफ़ की बात की है। उनका तर्क है कि यदि नाटो देश पूरी तरह रूस से तेल खरीदना बंद कर दें और चीन पर 50% से 100% तक टैरिफ़ लगा दें, तो युद्ध जल्दी खत्म हो सकता है। दिलचस्प यह है कि इस पूरे बयानबाज़ी में भारत को उन्होंने conspicuously अलग रखा।

यही बिंदु अमेरिकी नीति की सबसे बड़ी कमजोरी को उजागर करता है। ट्रंप का ध्यान मुख्य रूप से यूरोप और चीन पर है, जबकि वैश्विक दक्षिण, खासकर भारत, आज की बहुध्रुवीय दुनिया में निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति ने इस पूरे परिदृश्य में भारत को ऐसी स्थिति पर ला खड़ा किया है जहाँ पश्चिमी देशों से लेकर रूस और एशियाई शक्तियों तक, सभी को भारत के साथ तालमेल बिठाना मजबूरी बन गया है। मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्होंने संतुलनकारी दृष्टिकोण अपनाया— एक ओर अमेरिका और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी को गहरा किया, तो दूसरी ओर रूस से ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की।
आज भारत न केवल ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है, बल्कि यूरोप के लिए भी एक संभावित वैकल्पिक साझेदार बनता जा रहा है। यूरोपीय देशों को यह समझ आ चुका है कि यदि उन्हें चीन की पकड़ से बाहर निकलना है और ऊर्जा के नए स्रोत चाहिए, तो भारत के साथ संबंध मज़बूत करना ही सबसे व्यवहारिक विकल्प है। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देश अब भारत की ओर झुकाव दिखा रहे हैं—चाहे वह रक्षा सौदे हों, प्रौद्योगिकी सहयोग या व्यापारिक अवसर।
इसके विपरीत, ट्रंप की रणनीति बार-बार “टैरिफ़” और “सैन्य दबाव” जैसे कठोर उपायों तक सीमित रह जाती है। उनकी “you first” वाली शैली नाटो देशों में विश्वास पैदा करने के बजाय असमंजस और असहमति को जन्म देती है। यही कारण है कि उनकी बातें कठोर दिखने के बावजूद ठोस परिणाम नहीं ला पातीं।
भारत की विदेश नीति का यही “कूटनीतिक लचीलापन” उसे अमेरिका और यूरोप दोनों के लिए अपरिहार्य बनाता है। ट्रंप भारत पर अतिरिक्त टैरिफ़ लगाकर दबाव बनाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिका को भी अपने आर्थिक और भू-राजनीतिक लक्ष्यों के लिए भारत की आवश्यकता है। इसीलिए ट्रंप ने हालिया बयान में भारत को अलग रखकर संकेत दिया कि उनके पास न्यू दिल्ली के साथ एक अलग डील की संभावना बनी हुई है।
स्पष्ट है कि ट्रंप की आक्रामक बयानबाज़ी और टकराववादी रणनीतियाँ, प्रधानमंत्री मोदी की व्यावहारिक, संतुलित और दूरदर्शी कूटनीति के सामने कहीं ठहरती नहीं। आने वाले समय में जब यूरोप भारत के और करीब आएगा, तब यह और स्पष्ट हो जाएगा कि वैश्विक राजनीति का असली ध्रुव कौन है।
दुनिया बदल रही है। अमेरिका अभी भी अपनी ताकत और प्रभाव पर भरोसा करता है, पर भारत की कूटनीति ने यह साबित कर दिया है कि संतुलन, संवाद और व्यावहारिक सहयोग ही भविष्य का रास्ता है। ट्रंप की रणनीतियाँ शोर पैदा कर सकती हैं, लेकिन असली नेतृत्व और समाधान की कुंजी आज प्रधानमंत्री मोदी के हाथों में है।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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