अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई मौतों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि ईरानी सुरक्षा बल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग करते हैं या उनकी हत्या की जाती है, तो अमेरिका हस्तक्षेप कर सकता है।

ईरान में यह विरोध प्रदर्शन देश की खराब आर्थिक स्थिति, बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और मुद्रा के अवमूल्यन के कारण भड़क उठे हैं। कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुई हैं, जिनमें कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियाँ होने की खबर है। इसे हाल के वर्षों की सबसे गंभीर घरेलू अशांति माना जा रहा है।
ट्रम्प ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका स्थिति पर नज़र रखे हुए है और वह ईरानी जनता के साथ खड़ा है। उनके इस बयान को सीधे तौर पर ईरानी नेतृत्व के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों ने ट्रम्प की धमकी को सख्ती से खारिज किया है। उनका कहना है कि ईरान के आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार का विदेशी हस्तक्षेप अस्वीकार्य है और इसे देश की संप्रभुता पर हमला माना जाएगा। ईरानी नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि इस तरह की धमकियाँ क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकती हैं।
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन और उस पर अमेरिका की प्रतिक्रिया एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि मानवाधिकारों की रक्षा और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच की रेखा कहाँ खींची जानी चाहिए। ट्रम्प का आक्रामक बयान मानवीय संवेदना से अधिक शक्ति प्रदर्शन जैसा प्रतीत होता है, जो हालात को शांत करने के बजाय और भड़का सकता है।
यह सच है कि ईरान में जनता गहरे आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रही है और असंतोष स्वाभाविक है। लेकिन किसी बाहरी शक्ति की सैन्य धमकी, चाहे वह नैतिक समर्थन के नाम पर ही क्यों न हो, अक्सर आंदोलन की मूल मांगों को कमजोर कर देती है और शासन को दमन का और बहाना दे देती है।
ईरान की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित है। कोई भी संप्रभु राष्ट्र अपने आंतरिक मामलों में विदेशी दखल को स्वीकार नहीं करता। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच शब्दों की यह जंग पूरे मध्य-पूर्व को एक नए तनाव की ओर धकेल सकती है, जिसका खामियाज़ा अंततः आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है।
इस संकट का समाधान न तो धमकियों में है और न ही सैन्य हस्तक्षेप में। ज़रूरत है राजनीतिक संवाद, आर्थिक सुधार और जनता की वास्तविक समस्याओं को समझने की। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी संयम बरतते हुए कूटनीतिक दबाव और मानवाधिकारों की निगरानी तक ही खुद को सीमित रखना चाहिए।
यदि शक्ति की भाषा हावी रही, तो यह संकट सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक और गंभीर चुनौती बन सकता है।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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