रूस ने मानी कुछ अमेरिकी शर्तें, कई खारिज कीं, यूक्रेन संघर्ष पर नई कूटनीतिक हलचल तेज़

रूस ने मंगलवार को पुष्टि की कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर अमेरिकी प्रस्तावों में से कुछ को स्वीकार किया है, जबकि कुछ बिंदुओं को अस्वीकार कर दिया है। क्रेमलिन ने कहा कि मास्को में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई वार्ता “रचनात्मक” रही और बातचीत आगे भी जारी रहेगी।

क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्रि पेस्कोव ने कहा कि यह “एक जटिल प्रक्रिया” है जिसमें विचार-विमर्श कई स्तरों पर चल रहा है। उनका कहना था कि “कुछ प्रस्ताव स्वीकार किए गए, कुछ अस्वीकार्य पाए गए,” लेकिन यह वार्ता में सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।

हाल के महीनों में अमेरिका ने 28-बिंदु शांति प्रारूप को पुनर्गठित कर रूस और यूक्रेन के बीच संघर्षविराम की राह बनाने की कोशिश की है। यह प्रस्ताव पहली बार नवंबर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता से उभरा था। यूक्रेन और कुछ यूरोपीय देशों द्वारा उठाए जा रहे सवालों के बीच अमेरिकी मध्यस्थता लगातार जारी है।

क्रेमलिन ने यह भी कहा कि रूस जितनी बार आवश्यक हो, अमेरिका से बातचीत करने के लिए तैयार रहेगा। हालांकि, अंतिम समझौता तभी संभव होगा जब रूस की सुरक्षा और भू-राजनीतिक चिंताओं का समाधान हो।

रूस द्वारा अमेरिकी प्रस्तावों के “कुछ हिस्से” स्वीकार करने का संकेत पहली नज़र में शांति की दिशा में आगे बढ़ता कदम लगता है। लेकिन गहराई से देखें तो यह कदम उतना सरल नहीं है। दरअसल, रूस की रणनीति बेहद गणनात्मक है—वार्ता का दरवाज़ा खुला रखना, जबकि अपने मुख्य सैन्य और राजनीतिक लक्ष्यों पर कोई समझौता न करना।

इस बयान से यह साफ है कि रूस अपनी मंशाओं में लचीला नहीं हुआ है। पेस्कोव द्वारा “कुछ प्रस्तावों को अस्वीकार्य” बताना यही संकेत देता है कि मॉस्को अपनी उन शर्तों से पीछे नहीं हटना चाहता, जिनमें यूक्रेन के पूर्वी इलाकों पर नियंत्रण, सुरक्षा गारंटी और पश्चिमी सैन्य प्रभाव को सीमित करना शामिल है।

रूस एक साथ दो मोर्चों पर खेल रहा है—कूटनीतिक बातचीत और ज़मीनी बढ़त। शांति वार्ता इसे अंतरराष्ट्रीय दबाव से राहत देती है, जबकि युद्ध की स्थिति उसे बातचीत के टेबल पर “ऊँची कुर्सी” देती है। अमेरिका के साथ जारी संवाद का लाभ यह भी है कि रूस खुद को बातचीत के पक्षधर देश के रूप में पेश कर सकता है, जबकि वास्तविकता में वह संघर्ष के मैदान में कठोर स्थिति बनाए रखे हुए है।

यह कदम पश्चिमी शक्तियों के लिए भी चुनौतीपूर्ण है। अमेरिका शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है, लेकिन इसके लिए यूक्रेन और यूरोपिय सहयोगियों को साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा। यदि रूस केवल प्रतीकात्मक स्वीकृति देता है और असली मुद्दों पर अटका रहता है, तो यह वार्ता शांति के मार्ग पर कम और रूस के रणनीतिक हितों को साधने का जरिया अधिक हो सकती है।

यूक्रेन के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल है। एक ओर युद्ध का दबाव, दूसरी ओर कूटनीतिक फैसलों का भारी बोझ—दोनों के बीच उसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा का संतुलन ढूंढना होगा।

कुल मिलाकर, रूस का यह ताज़ा रुख आशा और संशय दोनों लेकर आता है। यह सही है कि बातचीत जारी रहना स्वयं में एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब तक रूस अपनी मूल शर्तों पर अडिग है और अमेरिका व उसके सहयोगी अपनी सुरक्षा एवं राजनीतिक सीमाओं को लेकर असमंजस में हैं, तब तक किसी ठोस समाधान की उम्मीद करना मुश्किल है।

शांति का मार्ग खुला है—लेकिन यह रास्ता अब भी काँटों से भरा है।

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

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Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.