डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा प्रस्तुत कथित “पीस प्लान” को लेकर उत्पन्न विवाद ने यूक्रेन-अमेरिका संबंधों में एक नया शोर जोड़ दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूक्रेन के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी ने सख्त शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि कीव ने न तो इस योजना की कोई शर्त मानी है और न ही रूस के सामने किसी प्रकार के समर्पण का संकेत दिया है। यह बयान उस समय आया है जब यूक्रेन जमीनी मोर्चे पर कठिन दौर से गुजर रहा है और पश्चिमी सहायता को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ रही है।

ट्रम्प की ओर से सामने आई कथित शांति योजना यूक्रेन से अपेक्षा करती है कि वह अपने प्रमुख क्षेत्रों—खासकर रूसी कब्ज़े वाले इलाकों—के भविष्य पर समझौता करे। यह शर्तें केवल राजनीतिक ही नहीं बल्कि यूक्रेन की संप्रभुता के लिए भी चुनौती के रूप में देखी गईं। इसलिए कीव की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी: यूक्रेन यह जंग अपनी शर्तों पर लड़ रहा है, न कि किसी बाहरी ताकत की सलाह पर।
यूक्रेन सुरक्षा परिषद के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दिया गया यह बयान दो अहम संदेश देता है। पहला—यूक्रेन किसी भी विदेशी शक्ति के दबाव में अपने राष्ट्रीय हितों से पीछे नहीं हटेगा। दूसरा—यूक्रेन की वर्तमान नेतृत्व व्यवस्था यह स्पष्ट कर देना चाहती है कि युद्ध का समाधान केवल यूक्रेनी जनता की अपेक्षाओं और हितों के अनुरूप ही होगा।
इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि ट्रम्प की कथित शांति योजना के बारे में यूक्रेन से पहले मीडिया और राजनीतिक गलियारों में अधिक चर्चा की गई। इससे यह संदेह भी गहराता है कि यह योजना वास्तविक कूटनीतिक प्रयास से अधिक एक राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा है। 2025 के अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य में ट्रम्प की सक्रियता और उनके रूस-यूक्रेन युद्ध पर विवादास्पद दृष्टिकोण को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह मुद्दा अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी एक बड़ा विमर्श बन चुका है।
यूक्रेन की चिंता भी वाजिब है। यदि अमेरिका, नाटो या अन्य पश्चिमी सहयोगी किसी बिंदु पर कथित तटस्थता की ओर बढ़ते दिखे, तो इससे रूस को रणनीतिक लाभ मिल सकता है। यूक्रेन यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी “डील” का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं है—विशेषकर तब, जब रूस लगातार युद्धविराम के नाम पर समय खरीदने की रणनीति अपनाता रहा है। यूक्रेन यह भी समझता है कि युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं जीता जाता, बल्कि सूचना और कूटनीतिक युद्ध भी समानांतर चलते हैं। इसी कारण शीर्ष सुरक्षा अधिकारी का यह खंडन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस विवाद का एक अंतरराष्ट्रीय पक्ष भी है। यूरोप और अमेरिका के बीच रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग स्तरों पर सोच दिखाई देती है। जहां यूरोप युद्ध के तत्काल समाधान के दबाव में है, वहीं अमेरिका में बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएँ यूक्रेन के लिए अनिश्चितता पैदा करती हैं। ऐसे में, ट्रम्प द्वारा पेश किया गया कोई भी प्रस्ताव—चाहे वह औपचारिक हो या अनौपचारिक—स्वाभाविक रूप से यूक्रेन की कमजोर स्थिति का लाभ उठाने वाला प्रतीत होता है। यही कारण है कि यूक्रेन किसी भी प्रकार के “अनुचित समझौते” की छवि से बचना चाहता है।
रूस के दृष्टिकोण से भी यह घटनाक्रम दिलचस्प है। मॉस्को बार-बार यह प्रचार करता रहा है कि पश्चिम यूक्रेन को युद्ध जारी रखने के लिए उकसा रहा है। ऐसे में ट्रम्प की कथित योजना पर विवाद रूस की इसी दलील को हवा दे सकता है। लेकिन यूक्रेन के स्पष्ट बयान ने इस दिशा में किसी भी भ्रम को समाप्त कर दिया है—कीव किसी भी परिस्थिति में अपनी संप्रभुता से पीछे हटने को तैयार नहीं।
इस सारे विवाद के बीच एक बात बिल्कुल स्पष्ट है—यूक्रेन के लिए यह केवल युद्ध नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। इसलिए किसी भी शांति योजना का आधार यूक्रेन की जमीन और जनता की इच्छा ही हो सकती है, न कि किसी अन्य देश की राजनीतिक सुविधा। आज की नियंत्रित और जटिल वैश्विक राजनीति में, यह स्पष्टता ही यूक्रेन की सबसे बड़ी ताकत है।
अंततः, ट्रम्प के कथित प्रस्ताव पर यूक्रेन का सख्त खंडन यह संकेत देता है कि युद्ध का समाधान तब तक संभव नहीं, जब तक सभी पक्ष वास्तविकता को स्वीकार करने और न्यायसंगत शांति के लिए तैयार न हों। उस समय तक, ऐसे राजनीतिक बयानों से केवल भ्रम बढ़ेगा—समाधान नहीं।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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