संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया भाषण फिर से यह दर्शाता है कि वे वैश्विक राजनीति में कितनी तीखी, टकराववादी और कभी-कभी असंगत भूमिका निभाना चाहते हैं। 56 मिनट के इस भाषण में उन्होंने प्रवासन, जलवायु परिवर्तन, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्ष जैसे मुद्दों पर अपने पुराने रुख को दोहराते हुए सहयोगी देशों और प्रतिद्वंद्वियों दोनों को कठघरे में खड़ा किया। लेकिन सबसे अहम पहलू वह रहा जब उन्होंने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की बात की और इस सूची में भारत और चीन को भी शामिल किया। यही बिंदु एशियाई परिप्रेक्ष्य में गंभीर सामरिक निहितार्थ लिए हुए है।

प्रवासन और जलवायु परिवर्तन: पश्चिमी राजनीति का आंतरिक एजेंडा
ट्रंप का वैश्विक प्रवासन पर हमला नया नहीं है। वे इसे राष्ट्रीय पहचान और संप्रभुता के लिए खतरा मानते हैं, जबकि मानवीय दृष्टिकोण से यह उन लाखों शरणार्थियों और प्रवासी मजदूरों की ज़रूरत है जो बेहतर जीवन की तलाश में सीमाएँ पार करते हैं। जलवायु परिवर्तन को उन्होंने “धोखा” करार देते हुए जीवाश्म ईंधनों पर लौटने का आह्वान किया। यह दृष्टिकोण न केवल वैज्ञानिक तथ्यों का खंडन करता है बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के प्रयासों को भी कमजोर करता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप पर दबाव
ट्रंप ने यूरोपीय सहयोगियों को चेताया कि यदि वे रूस से तेल खरीद जारी रखते हैं तो अमेरिका कठोर शुल्क और प्रतिबंध लगाएगा। उनकी यह रणनीति “आर्थिक दबाव के जरिए रूस को घुटनों पर लाने” की है। किंतु यूरोप में ऊर्जा की वास्तविकता यह है कि हंगरी, स्लोवाकिया और तुर्की जैसे देश रूसी तेल पर निर्भर हैं। ऐसे में अमेरिकी दबाव यूरोप को असहज स्थिति में डाल सकता है।
भारत और चीन के लिए संदेश
ट्रंप का भारत और चीन का नाम लेना विशेष महत्व रखता है। दोनों देश रूस से कच्चे तेल के बड़े खरीदार हैं।
भारत पर प्रभाव:
भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति नियंत्रण में बड़ी राहत पाई है।
यदि अमेरिका भारत पर प्रतिबंधात्मक दबाव डालता है तो यह न केवल ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करेगा बल्कि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी पर भी तनाव पैदा करेगा।
क्वाड (QUAD) जैसे मंचों पर सहयोग और हिंद-प्रशांत में चीन-नियंत्रण की अमेरिकी रणनीति, भारत की ऊर्जा-स्वतंत्रता को लेकर कठघरे में खड़ी हो सकती है।
चीन पर प्रभाव:
चीन रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार और रणनीतिक साझेदार बन चुका है।
ट्रंप का चीन-विरोध पहले से ही आर्थिक टकराव, व्यापार युद्ध और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में दिखाई देता रहा है।
रूस से ऊर्जा निर्भरता के मुद्दे पर चीन को निशाना बनाना दरअसल अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के एक और मोर्चे को खोलना है।
सामरिक निहितार्थ
भारत की दुविधा: अमेरिका और रूस के बीच संतुलन साधना भारत की विदेश नीति का मूल रहा है। यदि ट्रंप प्रशासन आर्थिक प्रतिबंधों को लागू करता है तो भारत को अपने रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत की नई परीक्षा देनी होगी।
चीन के साथ समीपता का जोखिम: अमेरिका का दबाव भारत को रूस से दूरी बनाने पर मजबूर कर सकता है, जिससे रूस और चीन की निकटता और बढ़ेगी। यह भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए प्रतिकूल हो सकता है।
वैश्विक ऊर्जा राजनीति: ट्रंप का रुख अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को अस्थिर करेगा। इससे विकासशील देशों पर महंगाई और आपूर्ति संकट का सीधा असर होगा।
भूराजनीतिक असंतुलन: यदि अमेरिका एकतरफा निर्णय लेकर प्रतिबंध लागू करता है, तो यह संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों को और अप्रभावी बनाएगा। इससे बहुपक्षीय सहयोग कमजोर होगा और वैश्विक व्यवस्था और खंडित हो सकती है।
ट्रंप का भाषण उनके चुनावी राजनीति और घरेलू समर्थन-आधार को साधने की कोशिश ज़्यादा प्रतीत होता है, बजाय इसके कि वह विश्व व्यवस्था के लिए कोई ठोस दृष्टि प्रस्तुत करता। भारत और चीन को लेकर उनकी चेतावनी साफ संकेत है कि आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता और अमेरिका-एशिया संबंधों में नई चुनौतियाँ खड़ी होंगी।
भारत के लिए यह क्षण कूटनीतिक संतुलन साधने का है—एक ओर अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी और दूसरी ओर रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे रक्षा व ऊर्जा संबंध। ट्रंप की कठोर भाषा यह दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति अब और भी ज्यादा ध्रुवीकृत होने जा रही है। ऐसे में भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की परंपरा पर और भी अधिक दृढ़ रहना होगा, ताकि वह ऊर्जा, सुरक्षा और सामरिक हितों को संतुलित कर सके।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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