Britain, Canada और Australia ने दी Palestine को मान्यता, Israel भड़का

ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम उठाते हुए फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी है। यह निर्णय केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि पश्चिमी राजनीति और मध्य-पूर्व के सामरिक परिदृश्य में दूरगामी प्रभाव डालने वाला है। विशेषकर ब्रिटेन की घोषणा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इज़राइल के आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन ने निर्णायक भूमिका निभाई थी।

मान्यता के पीछे की पृष्ठभूमि

ग़ज़ा युद्ध में लगातार बढ़ती मानवीय त्रासदी, हजारों निर्दोष नागरिकों की मौत और भूखमरी के दृश्य ने पश्चिमी देशों की आंतरिक राजनीति पर गहरा दबाव बनाया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने घोषणा करते हुए स्पष्ट किया कि यह निर्णय शांति प्रक्रिया और “दो राष्ट्र समाधान” (Two-State Solution) को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से लिया गया है।

कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने भी इसी तर्क को दोहराया, यह कहते हुए कि फिलिस्तीन की मान्यता आतंकवाद को वैध ठहराना नहीं है, बल्कि उन शक्तियों को मज़बूत करना है जो सह-अस्तित्व और शांति की राह पर चलना चाहती हैं।

इज़राइल की तीखी प्रतिक्रिया

इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस निर्णय को आतंकवाद के लिए “बड़ा इनाम” करार दिया। उनका तर्क है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में 1200 लोगों की मौत और 251 बंधकों की घटना को देखते हुए ऐसा कोई भी कदम इज़राइल की सुरक्षा के लिए खतरा है। साथ ही, इज़राइल के कट्टरपंथी सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने तो यहाँ तक कह दिया कि अब वेस्ट बैंक पर इज़राइली संप्रभुता लागू की जानी चाहिए — जो वस्तुतः उस क्षेत्र का विलय (Annexation) होगा।

फिलिस्तीन की उम्मीदें

फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे शांति और सह-अस्तित्व की दिशा में बड़ा कदम बताया। उनका कहना है कि अब “स्टेट ऑफ़ फिलिस्तीन” और “स्टेट ऑफ़ इज़राइल” पड़ोसी बनकर शांति और सुरक्षा के साथ रह सकते हैं।

सामरिक प्रभाव

मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन: यह कदम अरब दुनिया और मुस्लिम देशों में पश्चिमी देशों की साख बढ़ा सकता है। वहीं, इज़राइल के साथ रिश्तों में तनातनी की आशंका भी है।

अमेरिका की दुविधा: अमेरिका, जो इज़राइल का सबसे बड़ा सहयोगी है, ने तुरंत कोई टिप्पणी नहीं की। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही इस तरह की मान्यता के खिलाफ थे। अगर यूरोप के और देश (जैसे फ्रांस) भी यही रास्ता अपनाते हैं तो अमेरिका पर भी कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा।

भारत के लिए संदेश: भारत ने पारंपरिक रूप से फिलिस्तीन का समर्थन किया है, लेकिन हाल के वर्षों में इज़राइल के साथ सामरिक और तकनीकी संबंध काफी गहरे हुए हैं। इस नये घटनाक्रम से भारत को संतुलन साधने की कूटनीति अपनानी होगी।

भविष्य की शांति प्रक्रिया: मान्यता मिलने से फिलिस्तीन की अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत होगी, जिससे शांति वार्ताओं के लिए औपचारिक ढांचा तैयार हो सकता है। हालाँकि, इज़राइल की असहमति और हमास की मौजूदगी इस प्रक्रिया को कठिन बनाए रखेगी।

ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया का निर्णय एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह न केवल पश्चिमी कूटनीति में दरारें दिखाता है, बल्कि इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष में एक नया अध्याय भी खोलता है। यह मान्यता भले ही तुरंत शांति न ला सके, लेकिन इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि अब दुनिया केवल युद्ध और बर्बादी को देखने के बजाय समाधान की दिशा में ठोस पहल चाहती है।

यह कदम अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए ध्रुवीकरण की ओर संकेत कर रहा है, जहाँ मानवीय सरोकार और सामरिक हित आपस में टकरा रहे हैं।

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

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Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.