ट्रंप ने H-1B वीज़ा पर लगाया 1 लाख डॉलर वार्षिक शुल्क, भारतीय पेशेवरों पर संकट, अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने शुक्रवार को घोषणा की कि कंपनियों को H-1B वीज़ा पर काम करने वाले हर कर्मचारी के लिए प्रति वर्ष $100,000 शुल्क देना होगा। यह निर्णय खासतौर पर तकनीकी क्षेत्र को झटका देगा, क्योंकि अमेरिका की बड़ी आईटी और वित्तीय कंपनियाँ भारतीय और चीनी पेशेवरों पर गहराई से निर्भर हैं।

भारत के लिए निहितार्थ

प्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय पेशेवरों पर – भारत H-1B वीज़ा का सबसे बड़ा लाभार्थी है। पिछले वर्ष कुल अनुमोदित वीज़ाओं में 71% भारतीयों के हिस्से आए थे। इस फैसले से भारतीय आईटी पेशेवरों और इंजीनियरों के अमेरिका जाने के अवसर कम हो सकते हैं।

भारतीय आईटी कंपनियाँ जैसे इन्फोसिस, विप्रो और टीसीएस अमेरिकी क्लाइंट्स को सेवाएं देने के लिए H-1B वीज़ा पर निर्भर रहती हैं। शुल्क बढ़ने से इनकी लागत भारी बढ़ेगी और अमेरिका में परियोजनाएं महंगी पड़ेंगी।

प्रतिभा पलायन की चुनौती – यदि भारतीय तकनीकी पेशेवर अमेरिका जाने से हिचकिचाएँगे, तो उन्हें यूरोप, कनाडा या मध्य-पूर्व की ओर रुख करना पड़ सकता है। इससे भारत की वैश्विक टेक उपस्थिति नई दिशा में शिफ्ट हो सकती है।

भारत-अमेरिका रिश्तों पर दबाव – यह कदम द्विपक्षीय संबंधों को भी प्रभावित करेगा, क्योंकि भारत लगातार अमेरिका से H-1B वीज़ा व्यवस्था को लचीला बनाने की मांग करता रहा है।

अमेरिकी कंपनियों पर असर

लागत में अप्रत्याशित बढ़ोतरी – अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और जेपी मॉर्गन जैसी कंपनियाँ हजारों H-1B वीज़ा का इस्तेमाल करती हैं। अब हर वीज़ा पर $100,000 वार्षिक शुल्क देने से इन पर करोड़ों डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

स्टार्टअप्स और मिड-साइज़ कंपनियों पर संकट – बड़ी कंपनियाँ किसी हद तक अतिरिक्त लागत सहन कर सकती हैं, लेकिन छोटी टेक फर्म और स्टार्टअप्स के लिए यह भारी वित्तीय दबाव साबित होगा।

वैश्विक प्रतिभा आकर्षण में गिरावट – उच्च शुल्क लगाकर अमेरिका ने खुद अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता पर चोट की है। कई विश्लेषक मानते हैं कि इससे कंपनियाँ अनुसंधान और डेवलपमेंट (R&D) का काम भारत जैसे देशों में शिफ्ट कर सकती हैं।

शेयर बाज़ार की प्रतिक्रिया – इस फैसले की घोषणा के बाद अमेरिकी एक्सचेंज में सूचीबद्ध भारतीय आईटी कंपनियों के शेयर गिरे। कॉग्निज़ेंट के शेयर लगभग 5% नीचे बंद हुए, जबकि इन्फोसिस और विप्रो में 2–5% तक गिरावट दर्ज की गई।

आलोचना और समर्थन

आलोचक कहते हैं कि यह कदम “वैश्विक प्रतिभा आकर्षण” की अमेरिकी क्षमता को कमजोर कर देगा और नवाचार (innovation) पर चोट करेगा।

समर्थक (जिनमें कुछ अमेरिकी तकनीकी कर्मचारी शामिल हैं) मानते हैं कि H-1B कार्यक्रम का दुरुपयोग कर कंपनियाँ स्थानीय कर्मचारियों के वेतन को दबाती हैं।

एलन मस्क जैसे बड़े उद्योगपति कहते हैं कि H-1B वीज़ा के बिना अमेरिका “सबसे होनहार वैश्विक प्रतिभा” को खो देगा।

विश्लेषणात्मक दृष्टि

ट्रंप का यह फैसला अल्पकालिक राजनीतिक लाभ और “अमेरिकी नौकरियों की रक्षा” के नारे के अनुरूप है। लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से यह अमेरिका की टेक्नोलॉजी नेतृत्व क्षमता और वैश्विक नवाचार की स्थिति को कमजोर कर सकता है।

भारत के लिए यह एक चेतावनी है कि वह केवल अमेरिकी अवसरों पर निर्भर न रहे, बल्कि यूरोप, कनाडा, जापान और खाड़ी देशों जैसे नए बाज़ारों में भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए मजबूत अवसर तलाशे।

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

#H1BVisa #TrumpImmigration #TechIndustry #IndianIT #VisaCrisis #USImmigration #SkilledWorkers #Amazon #Microsoft #Wipro #Infosys #TalentCrisis #ImmigrationPolicy #GlobalInnovation

Leave a comment

About the author

Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.