अगले सप्ताह न्यूयॉर्क में जब 193 देशों के प्रतिनिधि और लगभग 150 राष्ट्राध्यक्ष/प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 80वें सत्र में जुटेंगे, तो माहौल असाधारण तनाव और अनिश्चितताओं से भरा होगा। इस बार का महासभा सत्र न सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के कारण सुर्खियों में है, बल्कि गाज़ा युद्ध, यूक्रेन संकट, फ़िलिस्तीन की मान्यता का सवाल और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी जटिलताएँ इसे और भी निर्णायक बना रही हैं।

भू-राजनीतिक उथल-पुथल और संयुक्त राष्ट्र की सीमाएँ
महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने सही कहा कि “हम असाधारण और अशांत जलधाराओं में नौकायन कर रहे हैं।” यह बयान वर्तमान विश्व परिदृश्य का सटीक चित्रण है। एक ओर गाज़ा में दो वर्षों से जारी युद्ध और मानवीय संकट ने वैश्विक विवेक को झकझोरा है, तो दूसरी ओर यूक्रेन पर रूसी आक्रमण तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) – जो प्रतिबंध लगाने या शांति स्थापित करने का एकमात्र सक्षम निकाय है – अमेरिका और रूस के वीटो अधिकारों की वजह से गहरी जकड़न में है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की वास्तविक उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
ट्रंप की वापसी और बहुपक्षवाद पर प्रश्न
इस महासभा का सबसे बड़ा आकर्षण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संबोधन होगा। अपने पहले कार्यकाल (2017–2021) में वे संयुक्त राष्ट्र की कई संस्थाओं से दूरी बना चुके थे—मानवाधिकार परिषद, UNESCO और पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलना उसी का हिस्सा था। अब अपने दूसरे कार्यकाल में वे विदेशी सहायता में कटौती और UN फंडिंग घटाने की नीति पर जोर दे रहे हैं। ट्रंप के आलोचक मानते हैं कि वे बहुपक्षीय सहयोग की बजाय एकतरफ़ा दबाव की राजनीति को तरजीह देते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप संयुक्त राष्ट्र को “बेहद संभावनाओं वाला मंच” मानते हैं, पर इसे “अपना कामकाज सुधारने” की नसीहत देते रहते हैं। इस मंच से वे एक बार फिर अपने “उपलब्धियों” का बखान कर नोबेल शांति पुरस्कार का दावा ठोक सकते हैं।
गाज़ा संकट और फ़िलिस्तीन की मान्यता
गाज़ा का मुद्दा इस महासभा में “हाथी” की तरह उपस्थित रहेगा। इज़रायल और हमास के बीच जारी युद्ध ने न सिर्फ़ हज़ारों जानें ली हैं बल्कि अकाल और भुखमरी की स्थिति पैदा कर दी है। अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर युद्ध अपराधों के आरोप लगाए हैं, हालांकि इज़रायल इसे सिरे से नकारता है। इस बीच कई पश्चिमी देश—ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम और कनाडा—फ़िलिस्तीन को मान्यता देने का ऐलान कर चुके हैं। हालांकि अमेरिका अब भी अपने पारंपरिक इज़रायल समर्थक रुख पर कायम है और उसने राष्ट्रपति महमूद अब्बास को वीज़ा देने से भी इनकार कर दिया है। नतीजतन, अब्बास वीडियो संदेश के ज़रिए महासभा को संबोधित करेंगे। यह कदम अमेरिका की “दोहरा मापदंड” नीति पर अंतर्राष्ट्रीय आलोचना को और तेज़ कर सकता है।
यूक्रेन युद्ध और पश्चिम-रूस टकराव
यूक्रेन संकट भी महासभा में एक अहम मुद्दा रहेगा। राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की और रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव दोनों यहां मौजूद होंगे। लेकिन चूंकि रूस और अमेरिका दोनों ही सुरक्षा परिषद में वीटो पावर रखते हैं, इस संघर्ष के समाधान में संयुक्त राष्ट्र से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। हाँ, महासभा एक बार फिर वैश्विक जनमत को परखने का मंच बनेगी।
ईरान परमाणु विवाद : आख़िरी समय की कूटनीति
28 सितंबर को ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के सभी प्रतिबंध पुनः लागू होने की आशंका है। ऐसे में राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची की उपस्थिति कूटनीतिक हलचल को और बढ़ा देगी। अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान को परमाणु हथियार क्षमता से रोकने के लिए दबाव बना रहे हैं, जबकि ईरान अपनी “वैधानिक परमाणु ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं” की बात करता है।
संकटों के बीच कूटनीति की परीक्षा
80वीं महासभा एक ऐसे समय में हो रही है जब अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था अभूतपूर्व तनाव से गुजर रही है। संयुक्त राष्ट्र का भविष्य भी इस पर निर्भर करेगा कि क्या वह इन संकटों में कोई ठोस पहल कर पाता है या केवल बयानबाज़ी तक सीमित रह जाता है। डोनाल्ड ट्रंप का रुख, गाज़ा-फ़िलिस्तीन विवाद, यूक्रेन युद्ध और ईरान का परमाणु कार्यक्रम—ये सभी मुद्दे संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता की कठिन परीक्षा लेने वाले हैं।
अंततः सवाल यही है कि क्या संयुक्त राष्ट्र “विश्व कूटनीति का विश्वकप” होकर केवल भाषणों और बयानबाज़ी का मंच बना रहेगा, या फिर यह वैश्विक संकटों में वास्तविक समाधान की दिशा दिखा पाएगा। इस महासभा से यही उम्मीद है कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की नई राह खुले, वरना बहुपक्षीय व्यवस्था का भविष्य और अधिक धुंधला हो जाएगा।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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