America के साथ मिलकर Taiwan ने बनाया पहला मिसाइल, China पर बढ़ा दबाव

ताइवान ने हाल ही में अमेरिका के साथ मिलकर विकसित किए गए अपने पहले मिसाइल का अनावरण किया है। बैराकुडा-500 नामक यह क्रूज़ मिसाइल न केवल तकनीकी साझेदारी का प्रतीक है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि ताइवान अब बाहरी हथियार आपूर्ति पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय रक्षा आत्मनिर्भरता की राह पर गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति और चीन के बढ़ते दबाव के बीच इस पहल को एक निर्णायक मोड़ माना जा सकता है।

चीन का दबाव और ताइवान की रणनीतिक चिंता

चीन लगातार यह दावा करता रहा है कि ताइवान उसका अभिन्न अंग है। बीते कुछ वर्षों में बीजिंग ने ताइवान पर सैन्य दबाव और तेज़ किया है—कभी युद्धाभ्यास, कभी लड़ाकू विमानों की उड़ानें और कभी समुद्री क्षेत्रों में जहाज़ों की तैनाती। इसका सीधा संदेश यही है कि ताइवान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग किया जाए और उसे आत्मसमर्पण के लिए बाध्य किया जाए।

लेकिन ताइवान का लोकतांत्रिक नेतृत्व इस दबाव के आगे झुकने के बजाय अपनी रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करने में जुट गया है। राष्ट्रपति लाई चिंग-ते पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका के साथ संयुक्त हथियार निर्माण अब ताइवान की प्राथमिकता है।

बैराकुडा-500 : तकनीकी सहयोग का प्रतीक

नेशनल चुंग-शान इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (NCSIST) द्वारा प्रदर्शित बैराकुडा-500 मिसाइल अमेरिकी डिफेंस स्टार्टअप एंड्युरिल इंडस्ट्रीज़ के सहयोग से विकसित की गई है। यह कम लागत वाला स्वायत्त क्रूज़ मिसाइल है, जिसे विशेष रूप से युद्धपोतों पर सामूहिक हमलों के लिए डिज़ाइन किया गया है।

NCSIST का लक्ष्य है कि इस मिसाइल का उत्पादन पूरी तरह ताइवान में हो और इसकी लागत प्रति मिसाइल लगभग 2.16 लाख अमेरिकी डॉलर से कम रहे। संस्थान के अध्यक्ष ली शिह-च्यांग ने साफ कहा कि ताइवान की स्थिति यूक्रेन जैसी नहीं है; यदि युद्ध या नाकेबंदी की स्थिति आती है तो उसके पास किसी पड़ोसी महाद्वीप से मदद लेने का विकल्प नहीं होगा। उसका सारा प्रतिरोध और सारी ताकत द्वीप के भीतर ही निर्मित करनी होगी।

आत्मनिर्भरता की राह

यह मिसाइल परियोजना ताइवान के लिए केवल तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर रक्षा नीति की दिशा में ठोस कदम है। ताइवान आने वाले वर्षों में अपने रक्षा खर्च को जीडीपी के पाँच प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य बना चुका है। इसका अर्थ है कि वह दीर्घकालिक रणनीति के साथ रक्षा सुदृढ़ीकरण कर रहा है।

साथ ही, NCSIST अमेरिका और कनाडा की छह कंपनियों के साथ अनुबंध और समझौते करने जा रहा है। इससे ताइवान को अत्याधुनिक तकनीक का सीधा लाभ मिलेगा और स्थानीय उत्पादन क्षमता बढ़ेगी।

वैश्विक राजनीति में निहितार्थ

इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश चीन को जाता है। ताइवान और अमेरिका की यह संयुक्त पहल बीजिंग को यह संकेत देती है कि ताइवान केवल प्रतीकात्मक प्रतिरोध तक सीमित नहीं है। वह अपनी रक्षा को मज़बूत बनाने और दीर्घकालिक संतुलन की दिशा में बढ़ रहा है।

यह स्थिति एशिया-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति को और जटिल बना सकती है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले ही चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन साधने के लिए रणनीतिक साझेदारी में जुटे हैं। अब ताइवान की इस पहल से चीन के खिलाफ सामरिक संतुलन और अधिक स्पष्ट होता दिखाई दे रहा है।

यूक्रेन युद्ध से सीख

ताइवान का यह कदम सीधे तौर पर यूक्रेन युद्ध से मिली सीख पर आधारित है। रूस के हमले के बाद यूक्रेन को यूरोपीय देशों से निरंतर हथियार और संसाधन मिलते रहे। लेकिन ताइवान की भौगोलिक स्थिति ऐसी नहीं है कि संकट की घड़ी में उसे तत्काल और निरंतर बाहरी मदद मिल सके। यही कारण है कि ताइवान ने पहले ही तय कर लिया है कि आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन ही उसकी सुरक्षा की गारंटी है।

भारत के लिए सबक

ताइवान की यह रणनीति भारत के लिए भी महत्त्वपूर्ण संकेत देती है। भारत लंबे समय से रक्षा आत्मनिर्भरता यानी मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की नीति को आगे बढ़ा रहा है। लेकिन ताइवान का उदाहरण यह दिखाता है कि तकनीकी साझेदारी और घरेलू उत्पादन को समानांतर रूप से बढ़ाना कितना आवश्यक है। यदि भारत भी रक्षा उत्पादन में विदेशी साझेदारों को आकर्षित कर स्थानीय उत्पादन लाइनों को मज़बूत करे, तो उसकी सुरक्षा क्षमताएँ और अधिक प्रभावी हो सकती हैं।

ताइवान का बैराकुडा-500 मिसाइल प्रोजेक्ट केवल एक हथियार विकास कार्यक्रम नहीं है; यह एशिया-प्रशांत की सुरक्षा संरचना में बदलते समीकरण का प्रतीक है। यह कदम बीजिंग के दबाव के बीच ताइवान की आत्मनिर्भरता और वाशिंगटन के सहयोग से निर्मित एक नई साझेदारी की घोषणा है।

अगले कुछ वर्षों में यह देखा जाएगा कि ताइवान अपनी रक्षा क्षमताओं को कितनी जल्दी आत्मनिर्भर बना पाता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह प्रयास केवल ताइवान तक सीमित नहीं रहेगा। यह एशिया-प्रशांत की राजनीति, वैश्विक शक्ति-संतुलन और चीन के बढ़ते प्रभाव के प्रतिकार में एक अहम भूमिका निभाएगा।

ताइवान ने यह साबित कर दिया है कि छोटे देश भी यदि स्पष्ट रणनीति और आत्मनिर्भरता की राह पर चलें, तो वे वैश्विक राजनीति में अपनी जगह सुरक्षित कर सकते हैं।

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

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About the author

Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.