संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र आयोग की ताज़ा रिपोर्ट ने एक बार फिर मध्य-पूर्व की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को झकझोर दिया है। आयोग ने साफ़ कहा है कि ग़ाज़ा में इज़राइल की कार्रवाई नरसंहार (Genocide) के दायरे में आती है और इसमें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सहित शीर्ष इज़रायली नेतृत्व की सीधी भूमिका है। यह निष्कर्ष केवल एक संवैधानिक या अकादमिक विमर्श नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय व्यवस्था के सामने खड़ा एक नैतिक और कानूनी प्रश्न है।

आयोग ने जिन तथ्यों को आधार बनाया है— क़त्लेआम, मानवीय सहायता की रोकथाम, जबरन विस्थापन, जीवन की परिस्थितियों को असहनीय बनाना और प्रजनन को रोकने जैसे कदम, वे 1948 की संयुक्त राष्ट्र नरसंहार संधि में परिभाषित चार बिंदुओं पर खरे उतरते हैं। यही संधि कभी यहूदी होलोकॉस्ट की भयावहता से सबक लेकर अस्तित्व में आई थी। विडंबना यह है कि उसी संधि का अब इज़राइल के विरुद्ध हवाला दिया जा रहा है।
इज़राइल ने इस रिपोर्ट को “घृणित” और “हामास समर्थक” कहकर खारिज किया है। उसका तर्क है कि वह 7 अक्टूबर 2023 को हुए हामास हमले के बाद आत्मरक्षा का अधिकार प्रयोग कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि आत्मरक्षा के नाम पर क्या इतनी बड़ी मानवीय तबाही को उचित ठहराया जा सकता है? ग़ाज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार अब तक 64,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और लाखों भुखमरी की कगार पर हैं। यह आँकड़ा दुनिया की अंतरात्मा को झकझोरने के लिए काफ़ी होना चाहिए।
यह रिपोर्ट केवल आँकड़ों का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है कि अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने आंखें मूंद लीं, तो यह 21वीं सदी के सबसे बड़े नैतिक पतन के रूप में दर्ज होगा। दक्षिण अफ्रीका की न्यायविद नवी पिल्लै, जिन्होंने रवांडा जनसंहार की जाँच की थी, का यह कहना कि “तुलना बेहद समान है” किसी भी संवेदनशील समाज को सिहराने के लिए पर्याप्त है।
अब सवाल केवल इज़राइल या ग़ाज़ा का नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अंतरात्मा का है। क्या संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और महाशक्तियाँ न्याय की कसौटी पर खरे उतरेंगे, या फिर ‘भू-राजनीति’ और ‘रणनीतिक हितों’ की बिसात पर निर्दोषों का ख़ून बहता रहेगा? इतिहास यह देखेगा कि दुनिया ने इस नरसंहार के आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया दी।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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