विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था का वर्तमान परिदृश्य इस बात का प्रमाण है कि अब किसी एक शक्ति का वर्चस्व टिकाऊ नहीं रहा। अमेरिका चाहे अभी भी खुद को महाशक्ति मानता हो, लेकिन बदलती परिस्थितियाँ उसके “धौंस भरे” कदमों को बार-बार चुनौती दे रही हैं। भारत और चीन, दोनों ने हालिया घटनाक्रम में यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि वे अब अमेरिकी दबाव में झुकने वाले नहीं हैं।

भारत के संदर्भ में देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने न केवल अमेरिका के संरक्षणवादी रुख को कठोरता से चुनौती दी, बल्कि उसे व्यापार वार्ता की मेज पर लौटने के लिए विवश कर दिया। अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50 प्रतिशत तक शुल्क थोपने का प्रयास साफ संकेत था कि वाशिंगटन अपनी “इकतरफा शर्तों” को लागू करना चाहता है। लेकिन भारत ने इसका जवाब धैर्य और रणनीतिक कठोरता से दिया। परिणाम यह हुआ कि अमेरिका के मुख्य वार्ताकार ब्रेंडन लिंच को दिल्ली का रुख करना पड़ा। यह केवल एक “वार्ता” नहीं बल्कि संकेत है कि भारत अब अपनी शर्तों पर बातचीत चाहता है और करवा भी रहा है।
दूसरी ओर, चीन ने अमेरिका के वैश्विक गठबंधनों (जी-7 और नाटो) के सहारे “शुल्क युद्ध” छेड़ने के प्रयास को सख्त शब्दों में खारिज किया। बीजिंग ने साफ कहा कि यह “आर्थिक दबाव और धौंस जमाने” का कदम है। चीन का यह रुख अमेरिका के लिए दोहरा झटका है— पहला, क्योंकि वह रूस के खिलाफ मोर्चा खड़ा करने में नाकाम होता दिख रहा है और दूसरा, चीन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता को हथियार बनाकर अमेरिका की नीति को कटघरे में खड़ा कर रहा है।
भारत और चीन दोनों की इन प्रतिक्रियाओं को यदि एक ही फ्रेम में देखें तो यह साफ है कि एशिया अब अमेरिकी “दादागिरी” का मौन शिकार नहीं रहेगा। भारत अपनी आत्मनिर्भरता और वैश्विक भागीदारी की ताकत के साथ अमेरिका से बराबरी का व्यवहार चाहता है, जबकि चीन सीधे-सीधे अमेरिकी गठबंधनों को चुनौती दे रहा है।
आज की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का संदेश स्पष्ट है— 21वीं सदी की दुनिया में संवाद, पारस्परिक सहयोग और संतुलन ही स्थिरता ला सकते हैं। अमेरिका जितना देर से यह समझेगा, उसके लिए वैश्विक नेतृत्व की कुर्सी उतनी ही अस्थिर होती जाएगी।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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