रूस और बेलारूस द्वारा शुरू किए गए “ज़ापाद-2025” (पश्चिम-2025) युद्धाभ्यास ने एक बार फिर पूर्वी यूरोप की सुरक्षा स्थिति को सुर्खियों में ला दिया है। नाटो (NATO) के साथ बढ़ते तनाव और पोलैंड द्वारा रूसी ड्रोन गिराने की घटना के तुरंत बाद यह सैन्य अभ्यास शुरू होना स्वाभाविक रूप से गहरी रणनीतिक संदेशवहन का हिस्सा है। लेकिन इस बार चौंकाने वाली बात यह रही कि अमेरिकी सैन्य अधिकारी स्वयं बेलारूस के प्रशिक्षण मैदान पर मौजूद थे— जहाँ बेलारूसी रक्षा मंत्री विक्टर ख्रेनिन ने उन्हें खुले तौर पर कहा कि “जो चाहें देखें, जिससे चाहें बात करें।”

यह दृश्य केवल सैन्य अभ्यास की औपचारिकता नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक समीकरण का संकेत है। बेलारूस—जो अब तक रूस का सबसे करीबी सहयोगी रहा है—अचानक अमेरिका के साथ संवाद और मेल-जोल के नए दरवाज़े खोल रहा है। अमेरिकी अधिकारियों की मौजूदगी और ट्रंप के प्रतिनिधि जॉन कोएल का मिन्स्क दौरा, जहाँ राष्ट्रपति लुकाशेंको ने 52 राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमति दी, यह दर्शाता है कि “कूटनीति और सौदेबाज़ी” की नई परत रूस-यूक्रेन युद्ध को प्रभावित कर सकती है।
अमेरिका ने बेलारूस की राष्ट्रीय एयरलाइन बेलाविया पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है और संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में मिन्स्क में अमेरिकी दूतावास फिर से खुल सकता है। ट्रंप की पहल है कि बेलारूस के साथ आर्थिक और राजनयिक संबंध सामान्य किए जाएं। यह स्पष्ट करता है कि वाशिंगटन, कीव और मॉस्को की त्रिकोणीय राजनीति के बीच बेलारूस को “संतुलनकारी” भूमिका में खींचने की कोशिश कर रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध की दिशा
इन घटनाक्रमों से युद्ध के भविष्य की एक झलक मिलती है। 2022 से चले आ रहे संघर्ष का सबसे बड़ा आधार यही था कि बेलारूस ने रूस को अपने क्षेत्र से यूक्रेन पर हमला करने की छूट दी। अब यदि बेलारूस आंशिक रूप से अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ नज़दीकी बढ़ाता है, तो यह मास्को के लिए कूटनीतिक झटका हो सकता है।
संभावित मध्यस्थता– ट्रंप खुले तौर पर युद्ध खत्म करने की कोशिशों की बात कर रहे हैं। लुकाशेंको जैसे नेता, जो पुतिन के करीबी हैं, लेकिन पश्चिम के दबाव से भी पूरी तरह अलग नहीं हो सकते, भविष्य में “शांति वार्ता” के पुल बन सकते हैं।
नाटो और रूस की टकराहट– पोलैंड द्वारा रूसी ड्रोन मार गिराना बताता है कि सीमा पर तनाव खतरनाक मोड़ ले सकता है। ज़ापाद-2025 इसी “नाटो-रूस तनाव” का जवाब है। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों की उपस्थिति यह भी दिखाती है कि टकराव के बीच बातचीत के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं हैं।
युद्ध का खिंचना बनाम समझौता– वर्तमान हालात संकेत देते हैं कि युद्ध न तो जल्दी खत्म होने वाला है और न ही निर्णायक विजय किसी पक्ष को मिलने वाली है। इस ठहराव में “राजनयिक सौदेबाज़ी” की संभावनाएँ बढ़ रही हैं, जहाँ बेलारूस एक “गेम-चेंजर” की तरह उभर सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल दो देशों का संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों की शक्ति-राजनीति का आईना है। बेलारूस की बदलती भूमिका, अमेरिका और ट्रंप की मध्यस्थता की कोशिशें और नाटो की आक्रामकता—ये सभी कारक बता रहे हैं कि युद्ध अब सीधे मोर्चे से हटकर “कूटनीतिक और रणनीतिक सौदे” की ओर बढ़ रहा है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि पुतिन इस नए समीकरण को कैसे लेते हैं—क्या वे लुकाशेंको पर भरोसा बनाए रखते हैं या बेलारूस के इस “नए संतुलन” को अपने खिलाफ मानते हैं।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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