लैटिन अमेरिका में नशीली दवाओं के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है अमेरिका या कर रहा है राजनीतिक दखलंदाजी?

लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र लंबे समय से अमेरिकी “ड्रग वॉर” की प्रयोगशाला बने हुए हैं। दशकों से अमेरिकी एजेंसियाँ नशीली दवाओं की तस्करी रोकने के लिए नावें, ट्रक और सीमा पर पकड़े गए कारवाँ रोकती रही हैं। लेकिन अब ट्रम्प प्रशासन के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने मार्को रुबियो की रणनीति इस पारंपरिक सोच से बिल्कुल अलग है—ड्रग माफिया से सीधे सैन्य टकराव।

रुबियो की आक्रामक सोच

रुबियो का मानना है कि सिर्फ तस्करी रोकना या पकड़े गए लोगों को सज़ा देना समाधान नहीं है। वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं: “इन्हें रोकना तभी संभव है जब आप इन्हें उड़ा देंगे।” हाल ही में कैरेबियन सागर में अमेरिकी सेना ने एक नाव पर हमला किया जिसमें 11 लोग मारे गए। इस कार्रवाई पर न तो कोई स्पष्ट कानूनी आधार दिया गया और न ही पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया अपनाई गई।

लैटिन अमेरिका में शक्ति प्रदर्शन और ‘मोनरो डॉक्ट्रिन’ की वापसी

रुबियो की नीतियों को उनके आलोचक 19वीं सदी के मोनरो डॉक्ट्रिन की नई व्याख्या मानते हैं—यानी अमेरिका को लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप का विशेषाधिकार है। वे वेनेज़ुएला, क्यूबा और निकारागुआ की वामपंथी सरकारों को “ग़ैर-क़ानूनी” करार देते रहे हैं और इन देशों में सत्ता परिवर्तन की openly वकालत करते हैं।

विशेषकर वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को वे “आतंकवादी संगठन का सरगना” बताते हैं। अमेरिका ने मादुरो की गिरफ्तारी पर 50 मिलियन डॉलर का इनाम भी घोषित किया है। हाल ही में कैरेबियन में अमेरिकी सैन्य जमावड़े से कयास लग रहे हैं कि क्या वेनेज़ुएला में सीधा सैन्य हस्तक्षेप होने वाला है।

कानूनी और राजनीतिक जोखिम

इस तरह के लक्षित हत्याओं और मिलिट्री स्ट्राइक को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानून और मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि यह “बिना सुनवाई हत्या” (extrajudicial killings) है। अमेरिकी राजनीति में भी एक धड़ा लगातार “फॉरएवर वॉर्स” और “रेजीम चेंज” की नीति का विरोध करता है। हालाँकि, ट्रम्प समर्थक गुट इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर सही ठहराते हैं। उनका मानना है कि फेंटानाइल और कोकीन जैसी दवाओं की बाढ़ रोकने के लिए यह सैन्य तरीका ज़रूरी है।

चीन और प्रवासन मुद्दा

रुबियो केवल ड्रग कार्टेल तक सीमित नहीं हैं। वे लैटिन अमेरिका में चीन की बढ़ती आर्थिक मौजूदगी को भी सुरक्षा खतरे के रूप में देखते हैं। पनामा नहर पर हांगकांग की कंपनी के संचालन का मुद्दा उठाकर उन्होंने अमेरिकी निवेशकों को लाने का दबाव बनाया। इसी तरह, उन्होंने प्रवासन (Migration) को भी “राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा” बताया है। उनका मानना है कि यदि अपराधी गिरोह और भ्रष्ट सरकारें खत्म कर दी जाएं तो प्रवासियों का प्रवाह भी घटेगा।

एल साल्वाडोर का मॉडल और मानवाधिकार प्रश्न

रुबियो ने एल साल्वाडोर के राष्ट्रपति नायिब बुकेले की नीतियों की सराहना की है। बुकेले ने सख्त कार्रवाई से अपराध पर काबू पाया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूह उन पर “मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और यातना” के आरोप लगाते हैं। इसके बावजूद, रुबियो उन्हें “लैटिन अमेरिका का आदर्श नेता” मानते हैं।

रुबियो की रणनीति लैटिन अमेरिका के लिए अमेरिकी नीति में एक नाटकीय बदलाव को दर्शाती है। ड्रग्स और सुरक्षा के नाम पर सैन्य कार्रवाई न केवल मानवाधिकारों पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह अमेरिका को एक बार फिर “हस्तक्षेपकारी साम्राज्य” के रूप में पेश करती है। प्रश्न यह है कि क्या यह नीति वास्तव में नशीली दवाओं के प्रवाह को रोकेगी, या फिर यह क्षेत्र में नए संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म देगी?

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

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About the author

Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.