भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों के बीच Nepal में सत्ता परिवर्तन, Sushila Karki ने संभाली बागडोर

नेपाल इन दिनों भीषण राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। भ्रष्टाचार और पुलिस की बर्बरता के खिलाफ भड़के Gen Z आंदोलन ने न केवल के.पी. शर्मा ओली को सत्ता से बाहर किया, बल्कि देश में अंतरिम सरकार की बहस को भी जन्म दिया। इसी क्रम में 73 वर्षीय पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की ने शुक्रवार देर शाम शपथ लेकर नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री का पद संभाल लिया। वह नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश और अब पहली महिला प्रधानमंत्री बनी हैं।

हिंसक प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि

बीते सोमवार और मंगलवार को हुए प्रदर्शनों में कम से कम 51 लोगों की मौत और 1,300 से अधिक घायल हुए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की हिंसा और सत्ता में बैठे नेताओं के भ्रष्टाचार पर खुलकर हमला बोला। कई थाने, बैंकों और सरकारी प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुँचा। हालांकि धीरे-धीरे कर्फ्यू में ढील दी जा रही है और बाजारों को सीमित समय के लिए खोला गया है।

अंतरिम सरकार और संवैधानिक संकट

सुशीला कार्की का नाम सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल और कुछ युवा आंदोलनों के समर्थन से सामने आया। लेकिन राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने साफ किया कि समाधान संविधान की सीमाओं में ही ढूँढा जाएगा। नेपाल के संविधान में यह प्रावधान है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश किसी संवैधानिक या राजनीतिक पद पर आसीन नहीं हो सकते। इस वजह से उनकी नियुक्ति कानूनी विवादों में घिर गई है। प्रमुख राजनीतिक दल — नेपाली कांग्रेस, माओवादी केंद्र और सीपीएन (यूएमएल) — भी इस नियुक्ति पर आपत्ति जता रहे हैं।

कार्की का रुख

शपथ लेने से पहले कार्की ने स्पष्ट किया—

“मैं तभी यह जिम्मेदारी लूंगी जब मुझे उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार और पुलिस हिंसा की निष्पक्ष जांच की अनुमति दी जाएगी। अगर मेरे हाथ-पाँव बाँध दिए गए तो मुझे इसमें कोई रुचि नहीं होगी।”

उनकी प्राथमिकता कानून-व्यवस्था बहाल करना और आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और मौतों की निष्पक्ष जांच कराना होगी।

भारत और कार्की का जुड़ाव

कार्की ने अपनी उच्च शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से की थी। उनके पति दुर्गा सुबेदी नेपाली कांग्रेस के सक्रिय नेता रहे हैं और 1973 में नेपाल एयरलाइंस विमान अपहरण प्रकरण में शामिल रहे, जिसका उद्देश्य नेपाल में लोकतंत्र की लड़ाई के लिए हथियार खरीदना था। यह ऐतिहासिक जुड़ाव आज भी नेपाल-भारत संबंधों में चर्चा का विषय है।

भविष्य की चुनौतियाँ

*नेपाल में संसद और राष्ट्रपति एक तरफ, जबकि सेना और युवा आंदोलन दूसरी तरफ खड़े हैं।

*कार्की का कार्यकाल तभी प्रभावी होगा जब वे संवैधानिक विवादों और राजनीतिक विरोधों के बीच अपना संतुलन बनाए रख पाएँगी।

*Gen Z आंदोलन अभी भी नेतृत्वविहीन है, लेकिन इसकी ऊर्जा नेपाल के लोकतांत्रिक ढांचे को नया मोड़ दे सकती है।

नेपाल फिलहाल एक संवैधानिक दुविधा और लोकतांत्रिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। सुशीला कार्की की नियुक्ति ने आशा और आशंका दोनों को जन्म दिया है। यदि वह पारदर्शी जांच और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाती हैं तो यह आंदोलन नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में मील का पत्थर बन सकता है। लेकिन अगर राजनीतिक दल और संविधान के प्रावधान बाधा बने, तो संकट और गहरा सकता है।

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

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About the author

Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.