गाज़ा पट्टी इस समय अभूतपूर्व मानवीय संकट से गुजर रही है। इज़रायल की नई सैन्य कार्रवाई और लगातार बढ़ते विस्थापन ने लाखों फ़िलिस्तीनियों को ऐसी दुविधा में डाल दिया है कि वे सुरक्षित स्थानों की तलाश में अपने घरों को छोड़ रहे हैं, लेकिन जिन शिविरों में वे शरण ले रहे हैं वहाँ हालात इतने बदतर हैं कि कुछ लोग मौत के ख़तरे के बावजूद वापस बमबारी वाले क्षेत्रों में लौटने पर मजबूर हो रहे हैं।

भीड़ और बेबसी
मवासी और अल-शाती जैसे तटीय इलाकों में लगाए गए मानवीय शिविरों में हालात इतने दयनीय हैं कि वहाँ शरण लेने वाले परिवारों को न तो तंबू मिल पा रहे हैं, न साफ पानी और न ही बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं। संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ की रिपोर्टें बताती हैं कि यह भीड़ अब आपसी संघर्ष और संसाधनों की लड़ाई को जन्म दे रही है।
विस्थापन की त्रासदी
अगस्त के अंतिम सप्ताह में 20,000 लोग गाज़ा सिटी से निकले, जबकि अगले ही सप्ताह यह संख्या 25,000 तक पहुँच गई।
इज़रायल ने मवासी को “मानवीय क्षेत्र” घोषित किया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने साफ कहा है कि वहाँ न तो पर्याप्त जगह है और न ही जीवनयापन की मूलभूत सुविधाएँ।
उपग्रह चित्रों में भी दिख रहा है कि समुद्र किनारे और खेतों में तंबुओं का जाल बिछ चुका है, जबकि खेती योग्य ज़मीन लगभग समाप्त हो चुकी है।
युद्ध और भूख की दोहरी मार
गाज़ा सिटी को संयुक्त राष्ट्र की भूख मॉनिटरिंग एजेंसी ने “अकालग्रस्त क्षेत्र” करार दिया है। भोजन की कमी, जल संकट और स्वास्थ्य सेवाओं का ध्वस्त ढाँचा मानवीय त्रासदी को और भयावह बना रहा है।
एक नए तंबू की कीमत 1000 डॉलर तक पहुँच चुकी है, जबकि आंतरिक यात्रा का खर्च भी सैकड़ों डॉलर में है।
अधिकांश लोग अपने सामान, बिस्तर, बर्तन और कपड़े छोड़कर सिर्फ उतना ही लेकर निकल पा रहे हैं जितना हाथ में उठाया जा सके।
राजनीतिक और सैन्य सन्दर्भ
इज़रायल कहता है कि वह हमास के छिपे ठिकानों और बचे हुए बंधकों को मुक्त कराने के लिए गाज़ा सिटी पर हमला तेज़ कर रहा है। वहीं, हमास यह दावा करता है कि वह नागरिक इलाकों को सैन्य उपयोग में नहीं लाता। परंतु हकीकत यह है कि बमबारी और विस्थापन का सबसे बड़ा बोझ आम नागरिकों पर ही पड़ रहा है।
मानवीय सवाल और भविष्य
क्या मवासी या अन्य “सुरक्षित क्षेत्र” सचमुच शरणार्थियों के लिए सुरक्षित हैं, जब वहीं भी बम गिराए जा रहे हैं?
अंतरराष्ट्रीय समुदाय किस हद तक गाज़ा के नागरिकों को तत्काल राहत पहुंचा पाएगा?
जब न ज़मीन बची है और न तंबू, तब लाखों लोग कहाँ जाएंगे?
गाज़ा इस समय एक खुली जेल में बदल चुका है, जहाँ भूख, विस्थापन और युद्ध तीनों एक साथ नागरिकों पर टूट रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि लोग बमों की बरसात वाले क्षेत्रों में लौटना बेहतर समझ रहे हैं क्योंकि वहाँ कम से कम उनके पास छत और पानी की कुछ उम्मीद है। यह स्थिति न केवल मानवीय संकट की चरम परिणति है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय तंत्र की असफलता का भी जीवंत उदाहरण है।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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