तकनीक की तेज़ रफ्तार दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) लगातार नई संभावनाएँ खोल रहा है। लेकिन यही तकनीक अब पारंपरिक मीडिया और पत्रकारिता के लिए चुनौती भी बनती जा रही है। गूगल द्वारा हाल ही में शुरू की गई AI Overviews और AI Mode जैसी सेवाओं ने समाचार उद्योग को गहरे संकट में डाल दिया है।

क्लिकों में भारी गिरावट
Financial Times और Daily Mail जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों ने रिपोर्ट किया है कि गूगल की एआई सेवाओं के कारण उनके वेबसाइट ट्रैफ़िक में 89% तक की गिरावट दर्ज की गई है। पहले जहाँ पाठक सीधे समाचार पोर्टल पर जाकर पूरी रिपोर्ट पढ़ते थे, वहीं अब गूगल का एआई उनके लिए संक्षिप्त सार प्रस्तुत कर देता है। परिणामस्वरूप, समाचार वेबसाइटों को मिलने वाली आय— जो मुख्य रूप से विज्ञापन और सब्सक्रिप्शन पर निर्भर है, गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
पारदर्शिता और न्यायसंगत मुआवज़े की माँग
समाचार संगठनों और मीडिया नियामकों का कहना है कि गूगल को अपने एआई एल्गोरिद्म और उसके काम करने के तरीके को पारदर्शी बनाना चाहिए। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि जिन समाचार स्रोतों से सामग्री ली जा रही है, उन्हें उचित मुआवज़ा मिले। अन्यथा स्वतंत्र और पेशेवर पत्रकारिता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
डिस्कवर फ़ीड में बदलाव और नई चिंताएँ
गूगल ने अपने मोबाइल Discover Feed में तीन-लाइन वाले एआई सारांश जोड़ दिए हैं। इसमें अब न तो प्रकाशन का लोगो दिखता है और न ही पूरा हेडलाइन। इससे दो बड़ी चिंताएँ उभरी हैं-
1- सटीकता का प्रश्न – क्या एआई द्वारा बनाए गए सारांश पूरी तरह सही और निष्पक्ष होंगे?
2- राजस्व संकट – यदि पाठक सीधे गूगल पर ही सूचना पा लें, तो समाचार संगठनों तक ट्रैफ़िक पहुँचेगा ही नहीं।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
पत्रकारिता केवल सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी भी है। यदि मीडिया की वित्तीय स्थिति कमजोर होती है, तो स्वतंत्र रिपोर्टिंग और खोजी पत्रकारिता पर असर पड़ेगा। गूगल जैसे टेक दिग्गजों को यह समझना होगा कि सूचना का मूल स्रोत वही पत्रकार हैं, जिनकी मेहनत से तथ्यों का संग्रह और विश्लेषण होता है।
इसलिए यह बहस केवल तकनीकी नवाचार बनाम पारंपरिक मीडिया की नहीं है, बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता और सूचना के अधिकार की भी है।
गूगल की एआई ओवरव्यू सेवाएँ उपयोगकर्ताओं के लिए तेज़ और आसान सूचना उपलब्ध करा रही हैं, लेकिन इसका खामियाजा समाचार संगठनों को झेलना पड़ रहा है। यदि जल्द ही कोई न्यायसंगत राजस्व-साझेदारी मॉडल तैयार नहीं किया गया, तो पत्रकारिता उद्योग एक बड़े अस्तित्व संकट का सामना कर सकता है।
-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)
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