Pentagon का नया नाम दुनिया के लिए क्या संकेत है?

अमेरिका की राजनीति और रक्षा नीति में एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पेंटागन को लेकर एक कार्यकारी आदेश जारी किया है, जिसके तहत रक्षा विभाग (Department of Defense) का नाम बदलकर युद्ध विभाग (Department of War) रखा जाएगा। यह केवल नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि अमेरिकी सैन्य रणनीति और वैश्विक छवि से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

युद्ध विभाग नाम रखने का राजनीतिक संदेश

ट्रंप का तर्क है कि अमेरिका ने विश्व युद्धों और बीते संघर्षों में जीत हासिल की, लेकिन “DoD” नाम ने राष्ट्र को “कमज़ोर और वोक” बना दिया। उनका मानना है कि “War Department” नाम दुनिया के सामने एक आक्रामक और मज़बूत छवि प्रस्तुत करेगा। राजनीतिक दृष्टि से यह कदम उनके समर्थक आधार को साधने की कोशिश है—यह संदेश कि अमेरिका अब भी शक्ति के दम पर शांति कायम कर सकता है।

लेकिन सवाल उठता है: क्या केवल नाम बदलने से सैन्य शक्ति या वैश्विक प्रभाव बढ़ेगा? कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह महज़ घरेलू राजनीति के लिए प्रतीकात्मक कदम है। इससे न तो चीन और रूस जैसी प्रतिद्वंद्वी शक्तियों की रणनीति प्रभावित होगी और न ही अमेरिकी सैनिकों की वास्तविक तैयारी। उल्टा, “War Department” नाम अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘युद्धप्रिय राष्ट्र’ की छवि दे सकता है, जिसका लाभ उसके विरोधी उठा सकते हैं।

भारी खर्च और प्रशासनिक सिरदर्द

इस फैसले का व्यावहारिक पहलू भी कम गंभीर नहीं है। रक्षा विभाग की मुहरों, सीलों और लोगो से लेकर, 40 देशों में फैली 7 लाख से अधिक इमारतों और कार्यालयों, यूनिफ़ॉर्म, स्टेशनरी, वेबसाइटों, ठेकेदार दस्तावेज़ों, यहाँ तक कि पेंटागन स्टोर के छोटे-छोटे सामान तक सब कुछ बदलना होगा। इसकी लागत अरबों डॉलर तक जा सकती है, जबकि यह पैसा सैन्य आधुनिकीकरण या सैनिकों की तैयारियों पर खर्च किया जा सकता था।

पेंटागन के कई अधिकारी पहले ही चिंता जता रहे हैं कि यह बदलाव केवल समय और संसाधनों की बर्बादी साबित होगा। “यह लाखों छोटे-छोटे झंझट पैदा करेगा और असली समस्याओं से ध्यान भटकाएगा,” एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा।

राजनीतिक टकराव और संवैधानिक पेच

संवैधानिक दृष्टि से यह नाम परिवर्तन आसान नहीं है। 1947 में जब रक्षा विभाग का गठन हुआ, तो इसके लिए कांग्रेस ने विधेयक पारित किया था। इसलिए औपचारिक नाम परिवर्तन भी कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना संभव नहीं है। हालाँकि, व्हाइट हाउस “सहायक नाम” (secondary name) अपनाने का रास्ता खोज रहा है, ताकि कानूनी अड़चनों से बचा जा सके।

यहीं से राजनीतिक टकराव तेज़ हो गया है। कुछ रिपब्लिकन सांसद ट्रंप के साथ खड़े हैं, लेकिन मिच मैककॉनेल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने इसे महज़ दिखावटी कदम बताया और कहा कि अगर इसे वास्तव में ‘War Department’ कहना है तो सैन्य बजट और क्षमताओं में भी ठोस बढ़ोतरी करनी होगी। डेमोक्रेटिक नेताओं ने तो इसे सीधे तौर पर ध्यान भटकाने वाली कवायद बताया है।

अंतरराष्ट्रीय असर और दार्शनिक प्रश्न

“Department of War” नाम अमेरिका के सहयोगियों और विरोधियों, दोनों पर असर डालेगा। सहयोगी देश इसे एक आक्रामक संकेत मान सकते हैं, जिससे अमेरिका की soft power को चोट पहुँच सकती है। वहीं विरोधी देश इसे अपने प्रचार तंत्र में इस्तेमाल कर सकते हैं, यह साबित करने के लिए कि अमेरिका शांति का नहीं बल्कि युद्ध का पक्षधर है।

इसके अलावा, रक्षा ठेकेदारों, विश्वविद्यालयों और एनजीओ के लिए भी यह सवाल खड़ा होगा कि क्या वे “युद्ध विभाग” के साथ काम करने में सहज महसूस करेंगे। यह केवल कानूनी या आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और दार्शनिक सवाल भी है।

आगे की चुनौतियाँ

ट्रंप को इस पहल को आगे बढ़ाने में कई बाधाओं का सामना करना होगा:

* कांग्रेस की मंज़ूरी – बिना औपचारिक विधेयक के नाम परिवर्तन स्थायी नहीं होगा।

* आर्थिक बोझ – अरबों डॉलर की लागत को लेकर विरोध बढ़ सकता है।

* प्रशासनिक अव्यवस्था – लाखों दस्तावेज़ों और प्रक्रियाओं में बदलाव लंबा समय और श्रम लेगा।

* राजनीतिक विभाजन – रिपब्लिकन दल के भीतर ही एकमत समर्थन न मिलना।

* अंतरराष्ट्रीय छवि संकट – सहयोगियों का भरोसा कम होना और विरोधियों को नैरेटिव मिलना।

ट्रंप द्वारा रक्षा विभाग का नाम बदलकर “युद्ध विभाग” रखने की कवायद महज़ rebranding नहीं है। यह एक ऐसा कदम है जो अमेरिकी राजनीति में ध्रुवीकरण को और गहरा करेगा और वैश्विक मंच पर अमेरिका की छवि को बदल देगा। सवाल यह नहीं है कि नाम क्या होना चाहिए, बल्कि यह है कि अमेरिका की वास्तविक प्राथमिकताएँ क्या होनी चाहिए—सैनिकों की तैयारी, आधुनिक तकनीक में निवेश और सहयोगियों का भरोसा बनाए रखना, या फिर प्रतीकात्मक फैसलों के ज़रिए घरेलू राजनीतिक लाभ लेना।

-ग्लोबल चर्चा नेटवर्क (GCN)

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About the author

Sophia Bennett is an art historian and freelance writer with a passion for exploring the intersections between nature, symbolism, and artistic expression. With a background in Renaissance and modern art, Sophia enjoys uncovering the hidden meanings behind iconic works and sharing her insights with art lovers of all levels. When she’s not visiting museums or researching the latest trends in contemporary art, you can find her hiking in the countryside, always chasing the next rainbow.