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अफगानिस्तान में हाल ही में आए भीषण भूकंप ने न सिर्फ 2200 से अधिक लोगों की जान ली, बल्कि तालिबानी शासन की लैंगिक पाबंदियों ने महिलाओं की पीड़ा को और गहरा कर दिया। मलबे में दबे लोगों को बचाने की कोशिशें हुईं, लेकिन “ग़ैर-रिश्तेदार पुरुषों द्वारा महिलाओं को छूने पर प्रतिबंध” ने महिला पीड़ितों की स्थिति को बेहद भयावह बना दिया।
परंपराएँ और तालिबानी फरमान: दोहरी मार
अफगान समाज में सदियों पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं के साथ तालिबान द्वारा लगाए गए लैंगिक प्रतिबंधों ने महिलाओं को “अदृश्य” बना दिया है। बचाव दल के पुरुष कर्मियों को महिलाओं को छूने या उठाने की इजाज़त नहीं, और तालिबान ने महिलाओं की शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में भागीदारी भी लगभग खत्म कर दी है। ऐसे में न महिला डॉक्टर हैं, न नर्सें, और न ही पर्याप्त महिला रेस्क्यू वर्कर्स। परिणामस्वरूप महिलाएँ मलबे में पड़ी रह जाती हैं, जबकि पहले पुरुषों और बच्चों को प्राथमिकता दी जाती है।
जीवित महिलाएँ पीछे, मृत शरीर आगे
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक काबुल के कुनार प्रांत की बिबी आयशा ने बताया कि भूकंप के 36 घंटे बाद जब बचाव दल पहुँचा, तो घायल महिलाओं को अनदेखा कर दिया गया। उन्हें एक कोने में बैठा दिया गया, लेकिन किसी ने उनकी ज़रूरतों के बारे में तक नहीं पूछा। कई मामलों में जब महिला रिश्तेदार मौजूद नहीं थीं, तो पुरुष शवों को कपड़ों से खींचकर बाहर निकालते रहे ताकि “सीधा संपर्क” न हो।
तालिबान की नीतियाँ: त्रासदी से भी बड़ा संकट
तालिबान ने 2023 से महिलाओं को मेडिकल शिक्षा में दाख़िले पर रोक लगा दी थी। नतीजा यह है कि ग्रामीण और आपदा प्रभावित इलाकों में महिला स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। कई अस्पतालों में तो एक भी महिला स्टाफ मौजूद नहीं। तालिबान शासन की यह नीति सिर्फ़ भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी महिलाओं की जान और अधिकार छीन रही है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र महिला एजेंसी (UN Women) की प्रतिनिधि सुसान फर्ग्यूसन ने चेतावनी दी है कि इस आपदा में भी सबसे अधिक बोझ महिलाओं और बच्चियों पर पड़ेगा, इसलिए राहत कार्यों में उनकी ज़रूरतों को केंद्र में रखना होगा। लेकिन सच्चाई यह है कि तालिबान अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपने कठोर लैंगिक प्रतिबंधों को हटाने के कोई संकेत नहीं दे रहा।
व्यापक असर: समाज और अर्थव्यवस्था पर चोट
-लड़कियों को छठी कक्षा से आगे स्कूल जाने की अनुमति नहीं।
-बिना पुरुष अभिभावक के महिलाओं की आवाजाही सीमित।
-रोजगार के अवसर लगभग खत्म, NGO और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भी महिलाओं पर रोक।
-UN एजेंसियों में कार्यरत महिलाओं को भी उत्पीड़न और धमकियों का सामना करना पड़ रहा है।
भूकंप ने अफगानिस्तान की सामाजिक और मानवीय त्रासदी को उजागर कर दिया है। यहाँ मलबे से बाहर निकलने से ज़्यादा मुश्किल महिलाओं के लिए तालिबान की जकड़ से निकलना है। प्राकृतिक आपदा अस्थायी है, लेकिन तालिबानी नीतियाँ अफगान समाज के भविष्य को स्थायी संकट में धकेल रही हैं। महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से वंचित रखना न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह अफगानिस्तान की सामाजिक स्थिरता और आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए भी सबसे बड़ा खतरा है।
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